16-05-2020 12:30:10 .
जगदलपुर। मेडिकल कॉलेज में एसी और इलेक्ट्रिकल मेंटेनेंस के नाम पर हर महीने लाखों रूपए का बंदरबाट अफसर कर रहे हैं। ऐसी ही एक शिकायत बुधवार को बस्तर कलेक्टर डॉ. अय्याज तंबोली से की गई है। शिकायतकर्ता जयंत अधिकारी ने शिकायती पत्र में कहा है कि पिछले एक साल से एसी और इलेक्ट्रिकल मेंटेनेंस के लिए कोई ठेका ही नहीं निकाला गया। अफसर इन कामों के लिए कोलकाता की एक कंपनी को बिना टेंडर के ही काम दिए जा रहे हैं। उसने शिकायत में कहा कि हर महीने एसी के मेंटेनेंस के लिए 8 लाख और इलेक्ट्रिकल मेंटेनेंस के लिए 8 लाख रूपए कुल 16 लाख रूपए जो हर साल 1 करोड़ 92 लाख रूपए का भुगतान किया जा रहा है। उसने शिकायत में कहा है कि अफसरों के साथ सांठ-गांठ कर इस काम का टेंडर ही जारी नहीं किया गया। शिकायतकर्ता ने कलेक्टर को यह भी बताया कि इस काम के लिए करीब 50 टेक्निशियन और 6 सब इंजीनियरों की जरूरत होती है, लेकिन इनकी भी नियुक्ति यहां नहीं की गई है। उसने कलेक्टर को बताया कि यदि इन कर्मचारियों की नियुक्ति होती तो फिर इनका पीएफ और वेज रजिस्टर मेंटेनेंस किया जाता। इधर इस मामले पर ज्यादा जानकारी लेने के लिए जब मेकॉज के डीन डॉ. यूएस पैकरा से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि टेंडर की जानकारी उनके पास नहीं है। इसके अलावा हाॅस्पिटल अधीक्षक डॉ केएल आजाद ने बताया कि इस काम का टेंडर रायपुर से होना था। चूंकि टेंडर नहीं हुआ, ऐसे में पहले जिस कंपनी ने टेंडर लिया था, उसी कंपनी को यह काम जारी रखने कहा गया था। उन्होंने बताया कि कंपनी को हर महीने के हिसाब से पैसों का भुगतान किया जा रहा है।
कमिशनखोरी का चस्का ऐसा कि 10 लाख रूपये के काम को 16 लाख में करवाया
इधर एसी मेंटेनेंस और इलेक्ट्रिकल मेंटेनेंस के जिस काम के लिए मेकाज प्रबंधन अभी हर महीने 16 लाख रूपये का भुगतान कर रहा है उस काम को शहर की ही कई कंपनियां हैं जो महीने दस लाख रूपये में करने को तैयार हैं। कंपनियों का कहना है कि दस लाख रूपये में भी उन्हें अच्छी खासी बचत होगी। ऐसे में अब सवाल खडे हो गये हैं कि आखिरकार एक साल तक बिना टेंडर के ही अफसर इतनी बड़ी रकम का काम चुपके से क्यों करवाते रहे। इसके अलावा जब कलकत्ता की कंपनी का टेंडर का टाईम खत्म हुआ था तो व्यवस्था को संचालित करने के लिए लोकल स्तर पर क्यों टेंडर कॉल नहीं करवाया गया। इसके अलावा कमीशन के चक्कर में मेंटेनेंस के काम में भी लापरवाही बरती गई और बिना सब इंजीनियरों और टेक्निशियनों के भरोसे ही व्यवस्था को संचालित किया गया। बताया जा रहा है कि इस मामले में मेकाज के हास्पिटल, कॉलेज और एकाउंट डिपार्टमेंट के एक बाबू की भूमिका संदिग्ध है। इन तीनों अफसरों ने मिलकर यहां पैसों का बड़ा बंदरबाट किया है। शहर में ऐसा ही काम करने वाली अल्फा कंपनी बताती है कि इस तरह के काम में हर महीने बमुश्किल चार से पांच लाख रूपये का खर्च होता है। यह खर्च भी तब जब आप पचास टेक्निशियन और सब इंजीनियरों की तैनाती की जाये।